शुरुआत
मेरा काम सत्तर के दशक के आख़िर में शुरू हुआ। उस समय इंदौर का व्यापार मंडी और कपड़ा मिल के इर्द-गिर्द घूमता था। पीथमपुर अभी बना नहीं था, सोया अभी वह नहीं हुआ था जो आज है, और धंधे का हिसाब बही में चलता था।
पहले कुछ साल मैंने वही किया जो उस उम्र में हर कोई करता है — कम समझा, ज़्यादा दौड़ा। जो सीख उन सालों से मिली वह यह थी कि नक़दी और मुनाफ़ा एक चीज़ नहीं हैं। यह बात किताब में पढ़ने पर आसान लगती है और अपने पैसे पर सीखने में महँगी पड़ती है।